Wednesday, July 20, 2016

पहले प्यार वाला " पुल "

हिरणी सी कुलाचे भरती ,बड़ी बड़ी आँखों वाली उस लड़की का आना जैसे   बसन्त की बयार थी या यू कहे फिजाओं में रौनक जैसे आगयी थी।और वो ?वो पहली दफा में ही उस पर मर मिटा था ।उसकी मासूमियत,भोलापन और   अल्हण जवानी और बिना साँस लिए बोलने की अदा।उसकी पहली मुलाकात और बातचीत कुछ यू शुरू हुए।वो अपनी छोटी बहन को ढूढ़ने उसके (लड़के) के घर आयी थी। लड़के की बहन और उसकी बहन एक ही कक्षा और एक ही स्कूल में पढ़ती थी ।और लड़के ने बताया के उसका नया क्वार्टर लिया गया है वही गयी होगी ।सब लोग वही गए है चलो वही पंहुचा देता हूँ।"तुम क्या करती हो?""पढ़ती हूँ " कहाँ?" किस क्लास में हो" "स्कूल नहीं कॉलेज में हूँ बीए सेकंड बीए सेकंड इयर में "और उसने कॉलेज का नाम बता दिया।"और आप क्या करते है?"मैं बीए फाइनल ईयर में""अरे वाह" वह खनकती सी हँसी हंस दी।और एक ही पल में एक असाधारण घटना घट गयी।उस 20 मिनट के रस्ते में वो एक दूसरे के बारे में बहुत कुछ जान गए और जब वो विदा हुयी तो लड़के का दिल अपना न रहा उसे जादूगरनी ले उड़ी थी।उस दिन वो एक साधारण सा पुल दो दिलों को जोड़ने का माध्यम बन गया।हा वो पुल तो बस पहले उसके लिए एक  साधारण सी थी जो केवल कॉलोनी और गांव जो जोड़ती थी मगर अब वो जादू की पुल हो गयी क्योंकि जादूगरनी पुल के उस पार की थी।लोहे की पुल पुरानी थी।

  1. उसकी मासूमियत,भोलापन और   अल्हण जवानी और बिना साँस लिए बोलने की अदा
  2. उस दिन वो एक साधारण सा पुल दो दिलों को जोड़ने का माध्यम बन गया।
  3. जादू की पुल हो गयी क्योंकि जादूगरनी पुल के उस पार की थी|
  4. इनलोगों का प्यार भी आँधी तूफान से गुजर रहा था|
  5. प्यार कभी टूटते टूटते बचता या कभी टिस भी होती उसी होल के जैसा।
  6. लड़की चहक उठी।उधर पूल की भी मरम्मत शुरू हो गयी ।आखिर क्या ठिकाना कब ढह जाये वक्त रहते मरम्मत हो जायेगी तो जिंदगी भी बच जायेगी।
मगर मजबूत ।धीरे धीरे उसका जादू बढ़ता गया।अक्सर उनको मिलाने में दोनों के छोटी बहनों को खूब रोल होता।माध्यम इतना अच्छा के दोनों एक दूसरे को देख चैन भी पा ले लेते और कही कोई शक की गुंजाइश भी न रहती। मगर कहते है के इश्क और मुश्क छुपाये नहीं छुपते।कॉलोनी का लड़का और पुल पार गांव की लड़की की ,इश्क की बात दबी दबी जबां से कहने लगे।इधर कभी कभी लड़की एकांत के क्षणों में डबडबायी आँखों से पूछती "तुम साथ तो नहीं छोड़ोगे?"और वो उसे कस कर अपनी बाहों में समेट लेता"पागल हो?हाथ पकड़ा है साथ चलने के लिए "और वो आश्वाशन पाकर उसके बाहों में दुबक जाती।दिन बीतते रहे और महीने साथ में बीत गए साल भी।दोनों छुप छुप कर मिलते मिलते थोडा खुल कर मिलने लगे। लड़की के घर वाले जान गए थे उन्हें एतराज नहीं था पीछे -2 सयानी बेटियां और पड़ी थी।लड़का बुरा न था अपने कुल का था ।सुन्दर था ।भविष्य था।वो आश्वस्त थे।मगर लड़के को घर पर बताना था बाकि था बस अड़ंगा ये था दो बड़ी बहने थी जिनकी अभी शादी करनी थी ।फिर पहले कैसे वो सोचे?खैर दोनों में झगड़े भी खूब होते।प्यार था तो तकरार भी।
इधर पुल भी बहुत पुराना होने के कारण कई जगह से टूट रहा था।जगह जगह होल नजर आने लगे थे पैर फसने का भी डर बना रहता मगर फिर भी पुल मजबूती से टिका रहा कितने गाड़िया या लोग उसके सीने को रौंदते चलते मगर जर्जर होने के बावजूद उसमे अभी गजब की ताकत थी।इधर इनलोगों का प्यार भी आँधी तूफान से गुजर रहा था।लोगों की कानाफूसी अब बन्द होकर सीधे सीधे व्यंग्य पर आगयी थी।और इनमें भी कभी   किसी की बात को लेकर या खुद की बातों को लेकर तकरार हो जाता।पुल सी जर्जर अवस्था में इनका भी प्यार कभी टूटते टूटते बचता या कभी टिस भी होती उसी होल के जैसा।मगर साथ न छूटा।बीतते बीतते 5साल गुजर गए ।इस प्यार को रिश्ते को कोई नाम हासिल नहीं हुआ।अब लड़की उकता गयी।घर के ताने के पीठ पिछे 3लड़किया और बैठी है कब ब्याहेगा ये लड़का?समाज के ताने अलग और ये लड़का कुछ करता क्यों नहीं?कब लेजायेगा मुझे?आखिर एक दिन बारिश की तरह बरस पड़ी।खूब रोई और कहा"अब तुम साफ साफ बताओ क्या करोगे?फिर झगड़ा शुरू हो गया।लड़का गुस्से में बोला "जाओ कर लो कही।"वो तड़प गयी ।क्या इतने साल की तपस्या इसी दिन के लिए थी?उसके मन में तो वो बस चूका है ।कैसे निकाले दिल से?"इधर पुल भी अब डगमगा रहा था।अब वो भी इतना जर्जर हो चूका था के शायद ही अब वो टिका रह पाता।लोग सम्भल के आते जाते।मगर भय बना रहता।इधर कुछ दिन दिन तनाव में गुजारे फिर लड़की रोते रोते शांत हो गयी।फिर उसी प्यार के खिलखिलाहट के साथ उसे कॉल की।लड़का फिर दीवानो के जैसा उससे बात करने लगा।उसकी इसी अदा का तो वो कायल था।न उसके दिल में नाराजगी ज्यादा दिन ठहरती न ही मुँह फूलना न दुखी रह पाती।हमेशा फूल सी खिली रहती।आखिर लड़के ने सच माना।हा अब बहुत हुआ चलो अब रिश्ते को नाम दे।लड़की चहक उठी।उधर पूल की भी मरम्मत शुरू हो गयी ।आखिर क्या ठिकाना कब ढह जाये वक्त रहते मरम्मत हो जायेगी तो जिंदगी भी बच जायेगी।सबको लगा ये इश्क में क्या नयी बात हुयी।न कोई दुश्मन था न कोई एतराज।वो तो लड़का ही देर.....मगर एक सच्चाई को किसी ने महसूस नहीं  किया।जहाँ आज के रिश्ते परिपक्व होकर भी शक की आंधी में तिनके की तरह बिखर रहे थे।प्यार के बरसात बिना सुख रहे थे ,वही एक नादानी से शुरू हुआ प्यार 6वर्ष तक मजबूती से टिका रहा।इन वर्षो में न जाने कितने लड़के के लिए रिश्ते आये ,अनबन ,तकरार और बचपना भी आया मगर न टुटा न छूटा तो वो था उनका सच्चा प्यार ।लोगों ने इसे साधारण लिया मगर आज के जमाने में एक के लिए इतनी ईमानदारी,सच्चाई ,सच्चा प्यार किसी को नजर न आया।आता भी नजर कैसे?आज तो झूठ और फरेब ऐसे छा गए है के लोगो को यही नजर आते है।इधर लड़के के घर शहनाई बज रही थी।उधर दो दिलों को जोड़ने वाली पूल भी चमचमाती नई बनी हुयी इतरा रही थी।क्योंकि जर्जर होने के बावजूद भी वो खुद को गिरने नहीं दी और आज मजबूती के साथ खड़ी थी । बिल्कुल उस सच्चे प्यार की तरह ...

बंदना चौवे
बलिया

Sunday, July 3, 2016

विचित्र किंतु सत्य


दुनियाभर का संभवतः अकेला गांव है राजस्थान के चुरू की तारानगर तहसील का गांव श्याम पांडिया जिसकी आबादी है एक व्यक्ति।

न घर न परिवार न कोई गली मोहल्ला आबादी सिर्फ एक आदमी और चारों ओर बिखरा बियावान जंगल यह गांव यहां की नेठवा ग्राम पंचायत का मजरा है वर्ष 2011 की जनगणना के रिकार्ड में यहां की आबादी एक पुरुष है महिला और बच्चों की संख्या शून्य है साक्षरता दर सौ प्रतिशत है और आबादी के नाम पर वह एक व्यक्ति भी यहां के मंदिर का पुजारी है
गांव में मंदिर के अलावा कोई आवासीय जगह नहीं है 521बीघा 18बिस्वा सरकारी भूमि में फैला गांव श्याम पांडिया राजस्व गांव है इसमें ग्राम पंचायत की ओर से डेढ बीघा जमीन आबादी के लिये छोडी गई है
सन् 2011 में जब जनगणना हुई थी तब मंदिर में पुजारी राजेश गिरी था बाद में वह यहां से चला गया ।अब ढाई तीन साल से अकेला ज्ञानदास यहां स्थाई रूप से रह रहा है।उसे मतदाता पचान पत्र व राशन कार्ड भी जारी हुये हैं बताते हैं कि सदियों से यह गांव आबाद है लेकिन इसकी जनसंख्या हमेशा से स्धिर है कहते हैं कि सदियों से यहां एक ही व्यक्ति रहता आया है और वह है मंदिर का पुजारी।
इस गाँव और मंदिर के प्रति आसपास के लोगों में गहरी आस्था है कारण कि पांडवों ने यहा तप किया था इसीलिये भादों की अमावस्या को इस मंदिर पर एक बडा मेला लगता है तब यहां जंगल में मंगल हो जाता है।फेसबुक पोस्ट से कॉपी पेस्ट है 

‘‘अच्छे दिन’’

   
       
अर्जुन सावेदिया
पूस की अमावस बीत चुकी थी। उजियारे पाख की रात में आकाश का खालीपन छिपाये नहीं छिप रहा था। शीत मौन था। मानो, जाड़ा छुट्टी पर हो। खेती धूल फाँक रही थी। बस एक आश थी और उसी आश में जी रहा आशाराम खेत में छबी फूँस की छान के नीचे टूटी खाट पर मैली सी रजाई ओढ़कर शवासन की सी मुद्रा में लेटा था। वह खुले आसमान पर निगाह गढ़ाये सूने बादलों को ताके जा रहा था। बस, अपने मन की रखने के लिए वह ठण्ड के दोहे ‘‘जाड़ो ठाड़ो खेत में हरि से करे पुकार, लज्जा मेरी राखियो चलै सरैरा ब्यार.......’’ का मन ही मन मनन कर रहा था। तभी उसके पेट में आंतें भूख से फिर गुड़गुड़ा उठीं। पर इस बार भूखी आँतों की यह गुड़गुड़ाहट रात के सन्नाटे को चीरती हुई खेत में बीचों-बीच खड़े आदमकद बिजूके से और आगे तक सुनाई दी। हड्डियों से जा लगे भूखे-पिचके पेट पर खिंची भूख की लकीरों को अपनी तकदीर मान, वह खाट में पड़े-पड़े सोचने लगा कि- ‘‘हे तथागत! माघ का महीना लग गया है। मगर शीत के अभी ढंग से दर्शन भी नहीं हुए हैं। न धुन्ध, न कोहरा, न ही कहीं कोई वर्षा-बौछार है..... न पिछले साल ढंग से बारिस हुई और न ही इस साल ठण्ड जोर पकड़ रही है। माघ के महीने में फाग सी तपन, जाने प्रकृति क्या चाहती है.......?’’ तभी भगदड़ की आवाज से उसका ध्यान टूट गया। देखा तो, नीलगायों का झुण्ड खेत में खड़ी अधमरी फसल को रोंदने में लगा था। अपनी फसल पर आँच आते देखकर न जाने उसमें कहाँ से इतनी ताकत आ गयी कि, वह झट से उठ खड़ा हुआ और जोर-जोर से टीन बजाने लगा। भागती नीलगायों को चेताते हुए आशाराम पूरी ताकत से चिल्लाया- ‘‘आइन्दा कभी इस खेत की तरफ रुख किया तो जान से मार दूँगा....... यह दाना मेरा है, मेरी चंपा का है, वो भूख के मारे दम तोड़.........।’’ पेट में अनाज का एक दाना नहीं, कई दिन के भूखे आशाराम के बदन का ताप बढ़ता जा रहा था। तभी अचानक से जाने कौन सा ख्याल आया उसे कि, फसल पर पड़ी उसकी नजर एकदम बेगानी-सी हो गयी थी। वह भूखे पेट पानी पीकर बिलकुल बे-फिकर हो यह विचारते हुए रजाई में मुँह ढक कर लेट गया कि ‘‘खेती जाये भाड़ में, यह खेत कोई मेरा थोड़े ही है, जिसका है वो मरे। मैं क्यों भूखे पेट चैड़े में अपनी रात काली करूं........?’’ आशाराम भले ही बे-चिन्ता था अब, पर उसकी आँखों से नींद गायब थी। बीती यादों के तमाम पन्ने एक-एक कर बारी-बारी से खुलते जा रहे थे, ......कभी दूधिया की भैंस, ......भट्टे पर ईंट थपाई, ......भैंस की ब्याज, ......तो कभी बटाई के खेत की काली यादें एक-एक करके उसके जेहन में उतरती जा रहीं थीं।

        ख्यालों में डूबे आशाराम के दिमाग में बीती बातें चलचित्र की भाँति चल रहीं थीं। अचानक उसके दिल-ओ-दिमाग में दूधिया और उसकी बदकिस्मत भैंस की यादें ताजा हो आयीं थीं। अभी पिछले साल चैमासे की बात है। भले ही आशाराम को दूधिया का बीज गणित कभी भी समझ नहीं आया था। पर जाने चंपा कैसी थी, जिसे दूधिया की ज्यामिति सरल रेखा लगी और वह उसके लपचे में आ गई। न जाने दूधिया ने क्या-क्या शर्त समझायीं उसे। मगर वह तो बस इतना ही समझ पाई कि दूधिया पचास हजार रूपयों की एक दुधारू भैंस खरीदकर देगा उसे। भैंस की रकम दूधिया चुकायेगा, लेकिन भैंस की मालकिन चंपा होगी। इसलिए वही भैंस को खिलायेगी, पिलायेगी और मय हारी-बीमारी के सारी देखभाल करेगी। बदले में दूधिया भैंस का सारा दूध चंपा से बाजार से आधी से भी कम कीमत पर खरीदेगा, जब तक कि भैंस की पूरी कीमत नहीं चुक जाती है। इस शर्त पर कि इस बीच यदि भैंस मरती है, तो हानि चंपा उठायेगी और मय ब्याज के भैंस की कीमत चुकायेगी। कुछ महिने तक सब ठीक रहा था। खेत हरे-भरे थे। खेतों की हर मेंढ़ पर चारा था। दूधिये को आधी कीमत पर दूध देने के बावजूद भैंस की खिलाई-पिलाई निकालकर चंपा को घर में दो पैसे दिख जाते थे। शायद, यह अच्छे दिन थे। पर अच्छे दिन दलितों की झोंपड़ी में ज्यादा दिन कब-कब ठहरे हैं, भला। यह मन की बात जब समय को बोध हुई, तब समय-सारणी अपने आप बदलती चली गयी और काल का पहिया घूम गया। धरती पानी को तरस गई, खेत बंजर हो गये और चारे के अभाव में एक दिन भैंस बीमार हो गई। उसने धरती पकड़ ली, वो फिर न उठी, जब तक कि वह काल के गाल में न समा गई। भैंस के मरते ही आशाराम का सब काम-धन्धा चैपट हो गया था। दूधिया शर्त की दुहाई देकर हर दूसरे दिन भैंस की रकम मय ब्याज के माँगने चंपा के द्वार पर आ जाता था। चंपा ने दूधिये से जान छुड़ाने के लिए आशाराम को एक उपाय सुझाया कि क्यों न हम दोनों जन भट्टे पर चले जायें। आशाराम को यह बात जँच गई। दोनों जन छः महिने के आवासीय करार पर ईंट थापने भट्टे पर चले गये और करार के बदले मिली कुल रकम पचास हजार रूपयों को उन्होंने दूधिये को हाथों-हाथ सौंप दिया था। यह कहकर कि भैंस की रकम चुकता हुई और रही बात ब्याज की, वो हम दोनों जन खाते-कमाते दे देंगे। भट्टे पर ईंट थापते-थापते करार बीत गया था। अब आशाराम और चंपा दोनों मुक्त थे। उनके तन पर कपड़ा था, पेट में रोटी थी और जेब में कुछ रूपये थे। चंपा चाहती थी कि इन पैसों से झोंपड़ी का नया छप्पर छब जाये इस बार। अगर कुछ पैसे बच गये तो दूधिया को भैंस की ब्याज देकर सुकून पा लेंगे। पर आशाराम नहीं माना, उसके सर पर तो खेत का भूत सवार था। वह बटाई पर खेती करके लाभ कमाना चाहता था। खेत का नाम सुनते ही चंपा खिसिया गई थी। वह अपना माथा पीटते हुए खीझकर बोली- ‘‘इस नाशपीटी बटाई की खेती के चक्कर में और कितना घाटा सहोगे....? आखिर तुम्हें कब समझ आयेगा कि तुम एक भूमिहीन दलित खेत-मजदूर हो, कोई किसान या कास्तकार नहीं। तुम्हारे पास इस गाँव में न पक्का घर है, न खेत है, न खलिहान है। दूसरों के खेत में खुरपी चलाते-चलाते तुम्हारा बुढ़ापा आ गया, पर जाने कब अकल आयेगी तुम्हें। पता है लोगों को बड़ा ताज्जुब होता है यह जानकर कि तुम अब तक बाहर नहीं निकल सके यहाँ से। जाने कितने लोग चले गये, तुम काहे नहीं गये? क्यों पड़े रहे यहाँ, मरने के लिए.....।’’

      मरने का ख्याल आते ही आशाराम की आँखों से आँसू छलक आये। उसके मन में चंपा की वह बात याद आ गई। जब चंपा ने एक बार बटाई की खेती से तंग आकर अकेले ही गाँव छोड़ने का फैसला कर लिया था। पर वही नहीं माना था, जिद कर बैठा था वह, कि अब बुढ़ापे में कहाँ जायेंगे। साहूकार से ब्याज पर कर्जा लेकर आशाराम ने चंपा की जोड़ी हुई एक-एक पाई सब पूँजी बटाई के खेत में झोंक दी थी। सिर्फ अच्छे दिनों की आश में कि सूखा हर साल पड़े यह जरूरी तो नहीं है। पर किसे पता था कि यह साल पिछले साल से भी बद्तर जायेगा और हलधर अन्न के दाने को तरसेगा।   

       आसमान में बीचों-बीच जगमग खिला चाँद धीरे-धीरे पश्चिम की ओर गमन कर रहा था। आधी से ज्यादा रात बीत चुकी थी। आशाराम की आँखों से नींद गायब थी। आखिर, भूखे पेट भला किसे नींद आती है। आशाराम तमस खाकर मन ही मन अनसुलझे सवालों की गाँठ खोलकर उन्हें एक-एक कर सुलझाये जा रहा था कि ‘‘सत्यानाश जाये उस मुफतखोर खेतवाले का, जो खुद तो खेती करता नहीं है। घाटे का सौदा हम जैसे भूमिहीन लोगों के माथे मढ़कर, बटाई के नाम पर मौज मारता है। खेत उसका और कर्जदार हम। खेती उसकी हम करें। हम ही हल चलायें, हम ही खाद-बीज डालें, सिंचाई करें, फसल उगायें। सब नफा-नुकसान हम उठायें और जब फसल पक कर तैयार हो जाये तो आधा हिस्सा उसका। धरती का इतना मोल......? वाह रे, धरतीपुत्र..... बस बहुत हुआ, मजदूरी कर लूंगा मैं। पर यह घाटे का सौदा कभी नहीं करूँगा। चंपा ठीक ही कहती थी........।’’ तभी आशाराम के पेट में एक जोर की मरोढ़ उठी। एक आह की धीमी-सी मरियल आवाज सुनाई दी और वातावरण एकदम छम्म पड़ गया। पूरब दिशा में भोर की दस्तक ने जैसे ही चुप्पी तोड़ी, चाँद मायूस होकर चुपचाप पश्चिम की ओर तेजी से टहल गया।

       सवेरे तड़के का वक्त था। खेत में छबी छान के पास भीड़ जमा थी। सबकी जुबां पर एक ही बात थी कि ‘‘बेचारा आशाराम भूख से मर गया। ये भूखमरी न जाने और कितनों को निगलेगी।’’ चंपा रो-रोकर बेसुध हुए जा रही थी। वह मरी-सी आवाज में जोर लगाकर रूदन करके सबको कल शाम की घटना बयान कर रही थी- ‘‘शाम को खेत की रखवाली करने जाते समय मारे भूख के उनसे खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था। उन्होंने टूटी जुबान से केवल इतना कहा था, कि बस एक रोटी का जुगाड़ कर दे चंपा तो आज जी जाऊँगा। लेकिन मैं क्या करती, घर में अन्न का एक दाना नहीं था। गाँव में सूखी बेहाली थी। मुझे भूखा और विवश देखकर, वे आँख में आँसू लिए भूखे पेट पानी पीकर ही खेत पर चले गये थे।’’ चंपा को बार-बार बेसुध होता देखकर न जाने किसने तहसील के पटवारी को सूचित कर दिया। भूख से मरने की खबर सुनकर तहसील में हड़कम्प मच गया। आधा घण्टा तब हुआ कि लेखपाल, पटवारी, कानूनगो, तहसीलदार समेत बड़े अधिकारियों की गाँव में लाईन लग गई थी। भूखी-प्यासी, रो-रोकर बेसुध हुई चंपा को आते ही सरकारी अस्पताल के डाॅक्टर ग्लूकोज पावडर पिलाने में लग गये थे। उधर घर पर मीडिया के आने से पहले ही अधिकारियों ने थोड़ा सा आटा रखवा दिया और खेत पर आकर मुआबजे का आश्वासन देकर चले गये थे। पुलिस को यह हिदायत देकर कि जल्दी से आशाराम के शव को पोस्ट-माॅर्टम के लिए भेज दो।

       दूसरे दिन अखवार में खबर छपी कि ‘‘बुन्देलखण्ड में सदमे की वजह से सीने में उठे दर्द के कारण एक भूमिहीन साठ वर्षीय किसान की मौत। सरकार ने पाँच लाख रूपये की मदद की घोषणा की।’’ और खबर के साथ ही अधिकारी का भुखमरी का खण्डन करते हुए बयान कि ‘‘जाँच के समय आशाराम के घर पर टीन के कनस्तर में आटा मिला है। पोस्ट-माॅर्टम रिपोर्ट के अनुसार यह मौत भूख से नहीं बल्कि सदमे के कारण हुई है।’’

       आज आशाराम की तेरहवीं है। शोक के दिन बीत रहे हैं आज। चंपा को मुआबजे की पहली किस्त मिल चुकी है। घर में नमक, तेल, लकड़ी और कनस्तर में आटा है। आखिर, किस चीज की कमी है? फिर भी चंपा न जाने क्यों खेत पर छबी छान की ओर देखती रहती है। पगली, दिन-रात एक ही माला फेरती रहती है कि ‘‘हे तथागत! ऐसे अच्छे दिन किसी को नसीब न हों।’’

                                

                                           अर्जुन सावेदिया
                          पता- नगला टीन, पोस्ट- धाँधूपुरा, आगरा-282006
                          मोबाइल नं0- 9410255666
                          लेखक देश के जाने-माने दलित कहानीकार एवं पेशे से शिक्षक है।

Wednesday, March 25, 2015

जातीय भँवर में बिहार का विकास











  बिहार की राजनीति में पिछले कुछ दिनों से चलने वाले सियासी हाई-वोल्टेज ड्रामे का अन्त हो चुका है I मँझधार में फँसे मांझी ने भी सदन में जाने से पहले ही मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर सदन में राज्यपाल के अभिभाषण के दौरान होने वाले हंगामे का भी अन्त कर दिया I जातीय प्रतीकों के भँवर में बुरी तरह फँसी बिहार की राजनीति भी एक प्रतीकात्मक मुख्यमंत्री के अन्त के साथ ही एक नये मुद्दे को जन्म देती दिखाई देती है I वैसे तो बिहार के साथ-साथ भारतीय राजनीति में भी प्रतीकों का अपना ही महत्व रहा है I हमारे पूर्व प्रधानमंत्री भी लंदन से पढ़ाई करने के बाद भी पिछले 10 वर्षों तक प्रतीकात्मक राजनीति की जीती जागती मिशाल रहे I संसदीय इतिहास में शायद पहली बार ऐसा हुआ कि बजट सत्र को संबोधित करने से ठीक पहले ही किसी राज्य के मुख्यमंत्री ने अपना त्यागपत्र दे दिया हो I इसी के साथ ही भारतीय राजनीति में व्यक्तियों को प्रतीक बनाकर जातीय राजनीति करने की पुरानी व्यवस्था को पुनः जीवनदान मिला है I
         16 मई 2014 को लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद जनता को लगने लगा था कि जातिगत आधार पर की जाने वाली राजनीति का अन्त हो गया है I मीडिया में भी हर जगह जातीय राजनीति के खत्म होने की चर्चायेँ होने लगी थी I कुछ समय से ऐसा लगने था कि विकास की राजनीति ने हर तरह की जातीय राजनीति को ध्वस्त कर दिया हो I लोग कहने लगे थे कि लोकसभा का चुनाव तो अमेरिका के पैटर्न पर था जिसमें जातीय-राजनीति का कोई स्थान नहीं है I लेकिन पिछले कुछ दिनों के राजनीतिक घटनाक्रम को देखें तो बिहार कि राजनीति में आये इस दिलचस्प मोड ने जातिगत-राजनीति को फिर से नई धार देनी शुरू कर दी है I अभी कुछ महीनों पहले तक बिहार के विकास पुरुष कहे जाने वाले नीतीश कुमार ने भारत की जनता को जातीय राजनीति के नये प्रतीक महादलित से अवगत कराया और उसके बाद अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए अनावश्यक दाव-पेचों का इस्तेमाल करके बिहार को एक संवैधानिक संकट में डाल दिया था I
         2005 में लालू से बिहार को मुक्त कराकर नीतीश कुमार ने बिहार में सुशासन और विकास की राजनीति के नये युग का सूत्रपात किया था लेकिन 2014 के लोक-सभा चुनाव के बाद से ही उन्होंने बिहार को फिर से जातीय भँवर में फँसा दिया I कुर्सी की इस लड़ाई में नीतीश कुमार की छवि को भी कोई कम नुकसान नहीं पहुंचाया है I आज भाजपा पर जाति कार्ड खेलने का आरोप लगाने वाले नीतीश कुमार इस बात को क्यों भूल जाते हैं कि मांझी को भी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर उन्होंने इसी जाति कार्ड के आधार पर ही बैठाया था I जो बिहार पिछले कुछ सालों से जीडीपी और विकास के लिये जाना जाने लगा था उसी बिहार ने जातीय समीकरणों के विकास का वही पुराना अध्याय लिखना प्रारम्भ कर दिया I संविधान के निर्माताओं ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि किसी राज्य में अल्पमत वाला मुख्यमंत्री भी हो सकता है I यह ठीक है कि मांझी अल्पमत में थे लेकिन संविधान अल्पमत या बहुमत वाले मुख्यमंत्री में कोई अंतर नहीं करता I ऐसा लगता है कि भारतीय संविधान बिहार की राजनीति में आये इस नये अध्याय के लिए पहले से तैयार नहीं था I
         अपने बेतुके बयानों-खुलासों से अपनी पहिचान बनाने वाले मांझी भी इस बात को भली-भांति जानते हैं कि उनके पास एक ऐसा प्रतीक है जिसकी काट किसी भी राजनीतिक दल के पास नहीं है I गरीब स्वाभिमान सम्मेलन के माध्यम से मंच से सभी समर्थन देने वाले विधायकों को मंत्री पद देने का ऐलान भी उन्होने कर दिया था लेकिन विधानसभा अध्यक्ष के डर से सदन में जाने से पहले ही उन्होंने अपना इस्तीफा राज्यपाल को दे दिया I राजनैतिक अनिश्चितता के इस दौर में बजट सत्र का पहला दिन प्रैस-कॉन्फ्रेंस की भेंट चढ़ गया I अभी तक सदन के सत्रों के हंगामे की भेंट चढ़ने की बात सुनते थे लेकिन आज प्रैस-कॉन्फ्रेंस की भेंट चढ़ने की बात पहली बार ही सुनाई पड़ी I इधर मांझी प्रैस-कॉन्फ्रेंस कर बताते है कि किस तरह से उन्हें और उनके विधायकों को जान से मारने की धमकी दी जा रही है और उधर नीतीश कुमार भी भावनाओं में बह जाने के लिए बिहार की जनता से माफी मांगने के साथ ही बीजेपी पर जाति कार्ड खेलने का आरोप लगाते हुए पूरे घटनाक्रम का दोष बीजेपी के सर डाल देते  है I राज्यपाल के विरोध में सदन के बाहर बैठे विधायक भी काली पट्टी को हटाकर एक दूसरे को गुलाल लगाने लगते हैं I पिछले कुछ दिनों से महादलित के अपमान पर होने वाली राजनीति भी अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचकर इस्तीफे साथ ही खत्म हो जाती है I
     जदयू, राजद, कांग्रेस और भाकपा के समर्थन से बनने वाली नयी सरकार महागठबंधन की बात तो करती है लेकिन उन्हें समर्थन देने वाले क्या नयी सरकार में शामिल होंगे, इस बात पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं देना चाहती है I जातीय प्रतीकों की राजनीति वाले बिहार की बिसात का भारतीय राजनीति में भी एक महत्वपूर्ण स्थान है I महादलित की राजनीति करने वाले हमारे राजनीतिक दलों को क्या महादलित का अपमान संविधान के अपमान से भी बड़ा लगने लगा था ? नैतिकता और न्याय की लड़ाई लड़ने की बात करने वाले हमारे राजनीतिक दल जात-पात की इस राजनीति से बिहार के कौन से सुनहरे भविष्य के निर्माण का सपना मन में रखते होंगे ?   
नितिन मिश्र
प्रवक्ता भौतिक विज्ञान
nitinmishra97@gmail.com
(09412812535)     

Tuesday, January 6, 2015

वोटों की बाढ़ से बदलाव की ओर बढ़ता कश्मीर


नितिन मिश्र 
क्रांतिकारी परिवर्तन के इस साल में कश्मीर घाटी में आयी भयानक बाढ़ ने लोगों के जन-मानस में लोकतंत्र के प्रति चाहत के लिए वोटों की बाढ़ का काम किया है I प्राकृतिक आपदा के सामने पूरी तरह विफल हुई कश्मीर की मौजूदा सरकार के लिए यह वास्तव में एक चुनौती भरा संदेश है I कँपकपाती सर्दी में भी शुरुवाती चरणों में केवल 8 घंटे में 71 प्रतिशत से अधिक वोटिंग एक बड़े बदलाव की ओर ही संकेत करता है I जहाँ हाल ही में अप्रैल-मई में हुए लोकसभा चुनाव में कश्मीर की जनता ने 52.6 प्रतिशत वोट करके भारत सरकार के गठन में अपनी भूमिका अदा की थी, वही केवल 6 महीनों में विकास बिजली और रोजगार की उम्मीद लगाये राज्य सरकार के महत्वपूर्ण गठन में लग गयी  है I
अभी कुछ दिनों पहले आयी स्टेट ऑफ वर्ल्ड पॉपुलेशन 2014 की रिपोर्ट के अनुसार अब हम एक ऐसी दुनियाँ में प्रवेश कर रहे हैं जब दुनियाँ में सबसे अधिक युवा होंगे I विश्व इतिहास में पहली बार आ रही इस स्थिति में विश्व में सबसे अधिक युवा आबादी की तादाद रखने वाले हमारे देश के लिए एक मजबूत लोकतान्त्रिक व्यवस्था, कानून के शासन और विकास के लिए समर्पित सरकार के दम पर विश्व इतिहास में अपनी उपस्थिति दर्ज करनी ही होगी I स्टेट ऑफ वर्ल्ड पॉपुलेशन की रिपोर्ट पर गहराई से विचार करें तो भारतीय युवाओं का एक मजबूत लोकतन्त्र के प्रति बढ़ता हुआ विश्वास वास्तव में इस रिपोर्ट को पहले ही स्पष्ट प्रकट कर चुका है कि हम एक नई दुनियाँ में प्रवेश कर रहे  हैं I कश्मीर के चुनाव के शुरुवाती चरणों में जिस तरह से वहाँ की जनता ने शांतिपूर्ण तरीके से अपने राज्य को विकास प्रदान करने की उम्मीद लिए जो वोटों की बाढ़ का आगाज किया है, वह सही मायनों में इस नयी युवा दुनियाँ के लिए अनुकरणीय है I आज विश्व में सबसे अधिक युवा जनसंख्या वाला देश होने के नाते इस नई दुनियाँ के प्रति हमारा उत्तरदायित्व भी अन्य देशों की अपेक्षा सबसे अधिक हो जाता है I मजबूत लोकतन्त्र के प्रति बढ़ती हुई कश्मीर की इस बाढ़ ने युवाओं के साथ-साथ बुजुर्गों और महिलाओं के जोश को भी बढ़ाने का कार्य किया है I
आने वाले कल को बेहतर बनाने के लिए आज कश्मीर की लड़कियाँ भी उत्साह के साथ अपने सुनहरे भविष्य के सपने मन में लिये हुए चुनावों में पूरे मन से हिस्सा ले रहीं हैं I  उनका कहना है कि दहशतगर्दों को सबक सिखाने का यही मौका है I ऊँची तालीम की तमन्ना लिए आज वो फिर से उसी भारत की तरफ देख रहीं हैं जहाँ कल्पना चावला और सुनीता विलियम्स जैसी महिलाओं ने पुरुषों के वर्चस्व को तोड़कर भारतीय इतिहास में अपनी उपस्थिति हमेशा के लिये दर्ज करा दी I कट्टरपंथी विचारधारा को करारा तमाचा देते हुए कश्मीर के बुजुर्गों ने भी अपने बच्चों के सुरक्षित भविष्य के लिए भारतीय लोकतन्त्र के प्रति बढ़ते हुए उत्साह को जिस तरह से मताधिकार का प्रयोग करके प्रकट किया है, वह वास्तव में हमेशा से लोकतन्त्र के विरोधी रहे हमारे पडौसी मुल्कों के लिए एक बढ़ा सबक है I एक नूतन सरकार के अभिनंदन के लिए एक माह से मनाया जा रहा यह महापर्व आज दुनियाँ के सबसे बड़े लोकतन्त्र में अपनी जड़ों को गहराई तक जमा चुका है I
2001 और 2011 के जनगणना आँकड़ों पर बारीखी से नजर डालें तो हम देखेंगे कि यह राज्य हमेशा से युवाओं को रोजगार और जनता को विकास देने से सर्वथा दूर रहा है I अगर राज्य सरकार के सरकारी आँकड़ों पर भी विश्वास करें तो पता चलता है कि 125 लाख की कुल आबादी वाले इस राज्य में 6 लाख युवा बेरोजगार हैं जबकि वास्तविक आँकड़ों में 15 लाख से अधिक कश्मीरी युवाओं के पास रोजगार नहीं है I करीब 2.5 लाख शिक्षित युवाओं के पास रोजगार का कोई भी साधन नहीं है जिनमें 42 हजार स्नातक और 11 हजार परास्नातक बेरोजगार भी शामिल हैं I आज इस नवीन युवा दुनियाँ में युवाओं का प्रतिनिधित्व कर रहे इस देश के लिए शिक्षित बेरोजगार युवाओं की बदहाली के यह आँकड़े एक शर्मिन्दगी के सबक के सिवाय और कुछ हो ही नहीं सकते I   भारतीय प्रायद्वीप का सिरमौर कहा जाने वाला यह राज्य, सभी राज्यों से अधिक      5 प्रतिशत बेरोजगारी दर के साथ अब तक भारत का सिरमौर ही बना हुआ है I चौंकाने वाले आँकड़ों में जहाँ देश में महिला बेरोजगारी 3.7 प्रतिशत है वहीं यह राज्य 16.3 प्रतिशत कि बढ़त बनाये हुए 20 प्रतिशत महिला बेरोजगारी के साथ अभी तक की सभी 15 राज्य सरकारों के जनता को विकास और युवाओं को रोजगार देने के खोखले दावों की हवा निकाल चुका है I     
2008 में हुई 61 प्रतिशत वोटिंग के बाद आये इस षष्ठवर्षीय उत्सव में कश्मीर की जनता ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया है I 68 सालों से लगातार लड़ाइयों और आतंकवाद का दंश झेल रहे कश्मीरवासियों के लिए 6 वर्ष के बाद आने वाले इस उत्सव को उत्साह के साथ ही मनाना चाहिए क्योंकि यही एक दिन उनके अगले 6 वर्षों के समाज और सरकार का निर्धारण करता है I आज कश्मीरवासी इस बात को अच्छी तरह समझ चुके हैं कि जब समस्त दुनियाँ भारत को एक मजबूत आर्थिक और लोकतान्त्रिक शक्ति के तौर पर देख रही है तब भारतीय लोकतन्त्र के प्रति उनका योगदान भी आवश्यक हो जाता है I अलगाववाद की जिस आग को लगाकर हमारे पडौसी मुल्क जिस तरह से 68 सालों से कश्मीर में अनुच्छेद 370 का सहारा लेकर लोगों को भ्रमित करने में लगे हुए हैं उसको 11 प्रतिशत की मतदान बढ़त के साथ हमारी जनता ने सिरे से ही नकार दिया है I
जून 1947 में महाराज हरि सिंह का अपने निजी स्वार्थ के लिए पेटदर्द का बहाना बनाकर भारतीय संघ में शामिल न होने के साथ कश्मीर को एक अलग स्वतंत्र राज्य रखना, आज तक कश्मीरवासियों की स्वतन्त्रता के लिए अभिशाप ही रहा है और महाराज हरि सिंह का वह पेटदर्द भारत सरकार के लिए सरदर्द बना हुआ है I लेकिन वोटों की बाढ़ से बदलाव की ओर बढ़ रही यह सुंदर घाटी, एक नवीन लोकतान्त्रिक सरकार के गठन को साथ लिए, आज इस नयी युवा दुनियाँ के सबसे बड़े लोकतन्त्र के सरदर्द को दूर करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाती हुई अपने धरती के स्वर्ग के गौरव को पुनः प्राप्त करने के लिए निकल चुकी है I
    
नितिन मिश्र
प्रवक्ता भौतिक विज्ञान
(09412812535, 07037609123)

nitinmishra97@gmail.com     

Tuesday, September 30, 2014

वक्त

                                  
                                                                                वक्त 
                                  वक्त है कितना कम 
                                 कुछ कर  दिखाने का है मन । 
                                वक्त तो बीएस गुजर जायेगा 
                                हमें मुश्कलों में छोड़ जायेगा । । 
                                पर भी दिल में एक तमन्ना है 
                                 कुछ कर दिखा कर हमें मरना  है । । 
                                वक्त गुजरता है बीएस गुजर जायेगा 
                                हमें आशाओं के भंवर में छोड़ जायेगा । । 
                               वक्त है कितना कम 
                                कुछ कर  दिखाने का है मन । 

                                                                                            राजीव वर्मा( कवि )

Saturday, September 20, 2014

आगरा में सजी उत्तर भारत की मशहूर जनकपुरी

दुल्हन की तरह सजा जनक महल 
सिया ब्याहने आये  राम ,आतुर हुए मिथिलावासी 
दयालबाग में सजी जनकपुरी , मिथिला नगरी में पधारे दूर -दराज  के लोग इस वर्ष दयालबाग में सजी जनकपुरी को लेकर लोगों में भरी उत्साह है । दयालबाग और उससे सटे  क्षेत्रों में लोगों में अपने घरों एवं प्रतिष्ठानो पर सजावट को दुल्हन की तरह सजा रखा है।