Sunday, July 3, 2016

‘‘अच्छे दिन’’

   
       
अर्जुन सावेदिया
पूस की अमावस बीत चुकी थी। उजियारे पाख की रात में आकाश का खालीपन छिपाये नहीं छिप रहा था। शीत मौन था। मानो, जाड़ा छुट्टी पर हो। खेती धूल फाँक रही थी। बस एक आश थी और उसी आश में जी रहा आशाराम खेत में छबी फूँस की छान के नीचे टूटी खाट पर मैली सी रजाई ओढ़कर शवासन की सी मुद्रा में लेटा था। वह खुले आसमान पर निगाह गढ़ाये सूने बादलों को ताके जा रहा था। बस, अपने मन की रखने के लिए वह ठण्ड के दोहे ‘‘जाड़ो ठाड़ो खेत में हरि से करे पुकार, लज्जा मेरी राखियो चलै सरैरा ब्यार.......’’ का मन ही मन मनन कर रहा था। तभी उसके पेट में आंतें भूख से फिर गुड़गुड़ा उठीं। पर इस बार भूखी आँतों की यह गुड़गुड़ाहट रात के सन्नाटे को चीरती हुई खेत में बीचों-बीच खड़े आदमकद बिजूके से और आगे तक सुनाई दी। हड्डियों से जा लगे भूखे-पिचके पेट पर खिंची भूख की लकीरों को अपनी तकदीर मान, वह खाट में पड़े-पड़े सोचने लगा कि- ‘‘हे तथागत! माघ का महीना लग गया है। मगर शीत के अभी ढंग से दर्शन भी नहीं हुए हैं। न धुन्ध, न कोहरा, न ही कहीं कोई वर्षा-बौछार है..... न पिछले साल ढंग से बारिस हुई और न ही इस साल ठण्ड जोर पकड़ रही है। माघ के महीने में फाग सी तपन, जाने प्रकृति क्या चाहती है.......?’’ तभी भगदड़ की आवाज से उसका ध्यान टूट गया। देखा तो, नीलगायों का झुण्ड खेत में खड़ी अधमरी फसल को रोंदने में लगा था। अपनी फसल पर आँच आते देखकर न जाने उसमें कहाँ से इतनी ताकत आ गयी कि, वह झट से उठ खड़ा हुआ और जोर-जोर से टीन बजाने लगा। भागती नीलगायों को चेताते हुए आशाराम पूरी ताकत से चिल्लाया- ‘‘आइन्दा कभी इस खेत की तरफ रुख किया तो जान से मार दूँगा....... यह दाना मेरा है, मेरी चंपा का है, वो भूख के मारे दम तोड़.........।’’ पेट में अनाज का एक दाना नहीं, कई दिन के भूखे आशाराम के बदन का ताप बढ़ता जा रहा था। तभी अचानक से जाने कौन सा ख्याल आया उसे कि, फसल पर पड़ी उसकी नजर एकदम बेगानी-सी हो गयी थी। वह भूखे पेट पानी पीकर बिलकुल बे-फिकर हो यह विचारते हुए रजाई में मुँह ढक कर लेट गया कि ‘‘खेती जाये भाड़ में, यह खेत कोई मेरा थोड़े ही है, जिसका है वो मरे। मैं क्यों भूखे पेट चैड़े में अपनी रात काली करूं........?’’ आशाराम भले ही बे-चिन्ता था अब, पर उसकी आँखों से नींद गायब थी। बीती यादों के तमाम पन्ने एक-एक कर बारी-बारी से खुलते जा रहे थे, ......कभी दूधिया की भैंस, ......भट्टे पर ईंट थपाई, ......भैंस की ब्याज, ......तो कभी बटाई के खेत की काली यादें एक-एक करके उसके जेहन में उतरती जा रहीं थीं।

        ख्यालों में डूबे आशाराम के दिमाग में बीती बातें चलचित्र की भाँति चल रहीं थीं। अचानक उसके दिल-ओ-दिमाग में दूधिया और उसकी बदकिस्मत भैंस की यादें ताजा हो आयीं थीं। अभी पिछले साल चैमासे की बात है। भले ही आशाराम को दूधिया का बीज गणित कभी भी समझ नहीं आया था। पर जाने चंपा कैसी थी, जिसे दूधिया की ज्यामिति सरल रेखा लगी और वह उसके लपचे में आ गई। न जाने दूधिया ने क्या-क्या शर्त समझायीं उसे। मगर वह तो बस इतना ही समझ पाई कि दूधिया पचास हजार रूपयों की एक दुधारू भैंस खरीदकर देगा उसे। भैंस की रकम दूधिया चुकायेगा, लेकिन भैंस की मालकिन चंपा होगी। इसलिए वही भैंस को खिलायेगी, पिलायेगी और मय हारी-बीमारी के सारी देखभाल करेगी। बदले में दूधिया भैंस का सारा दूध चंपा से बाजार से आधी से भी कम कीमत पर खरीदेगा, जब तक कि भैंस की पूरी कीमत नहीं चुक जाती है। इस शर्त पर कि इस बीच यदि भैंस मरती है, तो हानि चंपा उठायेगी और मय ब्याज के भैंस की कीमत चुकायेगी। कुछ महिने तक सब ठीक रहा था। खेत हरे-भरे थे। खेतों की हर मेंढ़ पर चारा था। दूधिये को आधी कीमत पर दूध देने के बावजूद भैंस की खिलाई-पिलाई निकालकर चंपा को घर में दो पैसे दिख जाते थे। शायद, यह अच्छे दिन थे। पर अच्छे दिन दलितों की झोंपड़ी में ज्यादा दिन कब-कब ठहरे हैं, भला। यह मन की बात जब समय को बोध हुई, तब समय-सारणी अपने आप बदलती चली गयी और काल का पहिया घूम गया। धरती पानी को तरस गई, खेत बंजर हो गये और चारे के अभाव में एक दिन भैंस बीमार हो गई। उसने धरती पकड़ ली, वो फिर न उठी, जब तक कि वह काल के गाल में न समा गई। भैंस के मरते ही आशाराम का सब काम-धन्धा चैपट हो गया था। दूधिया शर्त की दुहाई देकर हर दूसरे दिन भैंस की रकम मय ब्याज के माँगने चंपा के द्वार पर आ जाता था। चंपा ने दूधिये से जान छुड़ाने के लिए आशाराम को एक उपाय सुझाया कि क्यों न हम दोनों जन भट्टे पर चले जायें। आशाराम को यह बात जँच गई। दोनों जन छः महिने के आवासीय करार पर ईंट थापने भट्टे पर चले गये और करार के बदले मिली कुल रकम पचास हजार रूपयों को उन्होंने दूधिये को हाथों-हाथ सौंप दिया था। यह कहकर कि भैंस की रकम चुकता हुई और रही बात ब्याज की, वो हम दोनों जन खाते-कमाते दे देंगे। भट्टे पर ईंट थापते-थापते करार बीत गया था। अब आशाराम और चंपा दोनों मुक्त थे। उनके तन पर कपड़ा था, पेट में रोटी थी और जेब में कुछ रूपये थे। चंपा चाहती थी कि इन पैसों से झोंपड़ी का नया छप्पर छब जाये इस बार। अगर कुछ पैसे बच गये तो दूधिया को भैंस की ब्याज देकर सुकून पा लेंगे। पर आशाराम नहीं माना, उसके सर पर तो खेत का भूत सवार था। वह बटाई पर खेती करके लाभ कमाना चाहता था। खेत का नाम सुनते ही चंपा खिसिया गई थी। वह अपना माथा पीटते हुए खीझकर बोली- ‘‘इस नाशपीटी बटाई की खेती के चक्कर में और कितना घाटा सहोगे....? आखिर तुम्हें कब समझ आयेगा कि तुम एक भूमिहीन दलित खेत-मजदूर हो, कोई किसान या कास्तकार नहीं। तुम्हारे पास इस गाँव में न पक्का घर है, न खेत है, न खलिहान है। दूसरों के खेत में खुरपी चलाते-चलाते तुम्हारा बुढ़ापा आ गया, पर जाने कब अकल आयेगी तुम्हें। पता है लोगों को बड़ा ताज्जुब होता है यह जानकर कि तुम अब तक बाहर नहीं निकल सके यहाँ से। जाने कितने लोग चले गये, तुम काहे नहीं गये? क्यों पड़े रहे यहाँ, मरने के लिए.....।’’

      मरने का ख्याल आते ही आशाराम की आँखों से आँसू छलक आये। उसके मन में चंपा की वह बात याद आ गई। जब चंपा ने एक बार बटाई की खेती से तंग आकर अकेले ही गाँव छोड़ने का फैसला कर लिया था। पर वही नहीं माना था, जिद कर बैठा था वह, कि अब बुढ़ापे में कहाँ जायेंगे। साहूकार से ब्याज पर कर्जा लेकर आशाराम ने चंपा की जोड़ी हुई एक-एक पाई सब पूँजी बटाई के खेत में झोंक दी थी। सिर्फ अच्छे दिनों की आश में कि सूखा हर साल पड़े यह जरूरी तो नहीं है। पर किसे पता था कि यह साल पिछले साल से भी बद्तर जायेगा और हलधर अन्न के दाने को तरसेगा।   

       आसमान में बीचों-बीच जगमग खिला चाँद धीरे-धीरे पश्चिम की ओर गमन कर रहा था। आधी से ज्यादा रात बीत चुकी थी। आशाराम की आँखों से नींद गायब थी। आखिर, भूखे पेट भला किसे नींद आती है। आशाराम तमस खाकर मन ही मन अनसुलझे सवालों की गाँठ खोलकर उन्हें एक-एक कर सुलझाये जा रहा था कि ‘‘सत्यानाश जाये उस मुफतखोर खेतवाले का, जो खुद तो खेती करता नहीं है। घाटे का सौदा हम जैसे भूमिहीन लोगों के माथे मढ़कर, बटाई के नाम पर मौज मारता है। खेत उसका और कर्जदार हम। खेती उसकी हम करें। हम ही हल चलायें, हम ही खाद-बीज डालें, सिंचाई करें, फसल उगायें। सब नफा-नुकसान हम उठायें और जब फसल पक कर तैयार हो जाये तो आधा हिस्सा उसका। धरती का इतना मोल......? वाह रे, धरतीपुत्र..... बस बहुत हुआ, मजदूरी कर लूंगा मैं। पर यह घाटे का सौदा कभी नहीं करूँगा। चंपा ठीक ही कहती थी........।’’ तभी आशाराम के पेट में एक जोर की मरोढ़ उठी। एक आह की धीमी-सी मरियल आवाज सुनाई दी और वातावरण एकदम छम्म पड़ गया। पूरब दिशा में भोर की दस्तक ने जैसे ही चुप्पी तोड़ी, चाँद मायूस होकर चुपचाप पश्चिम की ओर तेजी से टहल गया।

       सवेरे तड़के का वक्त था। खेत में छबी छान के पास भीड़ जमा थी। सबकी जुबां पर एक ही बात थी कि ‘‘बेचारा आशाराम भूख से मर गया। ये भूखमरी न जाने और कितनों को निगलेगी।’’ चंपा रो-रोकर बेसुध हुए जा रही थी। वह मरी-सी आवाज में जोर लगाकर रूदन करके सबको कल शाम की घटना बयान कर रही थी- ‘‘शाम को खेत की रखवाली करने जाते समय मारे भूख के उनसे खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था। उन्होंने टूटी जुबान से केवल इतना कहा था, कि बस एक रोटी का जुगाड़ कर दे चंपा तो आज जी जाऊँगा। लेकिन मैं क्या करती, घर में अन्न का एक दाना नहीं था। गाँव में सूखी बेहाली थी। मुझे भूखा और विवश देखकर, वे आँख में आँसू लिए भूखे पेट पानी पीकर ही खेत पर चले गये थे।’’ चंपा को बार-बार बेसुध होता देखकर न जाने किसने तहसील के पटवारी को सूचित कर दिया। भूख से मरने की खबर सुनकर तहसील में हड़कम्प मच गया। आधा घण्टा तब हुआ कि लेखपाल, पटवारी, कानूनगो, तहसीलदार समेत बड़े अधिकारियों की गाँव में लाईन लग गई थी। भूखी-प्यासी, रो-रोकर बेसुध हुई चंपा को आते ही सरकारी अस्पताल के डाॅक्टर ग्लूकोज पावडर पिलाने में लग गये थे। उधर घर पर मीडिया के आने से पहले ही अधिकारियों ने थोड़ा सा आटा रखवा दिया और खेत पर आकर मुआबजे का आश्वासन देकर चले गये थे। पुलिस को यह हिदायत देकर कि जल्दी से आशाराम के शव को पोस्ट-माॅर्टम के लिए भेज दो।

       दूसरे दिन अखवार में खबर छपी कि ‘‘बुन्देलखण्ड में सदमे की वजह से सीने में उठे दर्द के कारण एक भूमिहीन साठ वर्षीय किसान की मौत। सरकार ने पाँच लाख रूपये की मदद की घोषणा की।’’ और खबर के साथ ही अधिकारी का भुखमरी का खण्डन करते हुए बयान कि ‘‘जाँच के समय आशाराम के घर पर टीन के कनस्तर में आटा मिला है। पोस्ट-माॅर्टम रिपोर्ट के अनुसार यह मौत भूख से नहीं बल्कि सदमे के कारण हुई है।’’

       आज आशाराम की तेरहवीं है। शोक के दिन बीत रहे हैं आज। चंपा को मुआबजे की पहली किस्त मिल चुकी है। घर में नमक, तेल, लकड़ी और कनस्तर में आटा है। आखिर, किस चीज की कमी है? फिर भी चंपा न जाने क्यों खेत पर छबी छान की ओर देखती रहती है। पगली, दिन-रात एक ही माला फेरती रहती है कि ‘‘हे तथागत! ऐसे अच्छे दिन किसी को नसीब न हों।’’

                                

                                           अर्जुन सावेदिया
                          पता- नगला टीन, पोस्ट- धाँधूपुरा, आगरा-282006
                          मोबाइल नं0- 9410255666
                          लेखक देश के जाने-माने दलित कहानीकार एवं पेशे से शिक्षक है।

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