
बिहार की राजनीति में पिछले कुछ दिनों से चलने वाले सियासी हाई-वोल्टेज
ड्रामे का अन्त हो चुका है I मँझधार
में फँसे मांझी ने भी सदन में जाने से पहले ही मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर सदन
में राज्यपाल के अभिभाषण के दौरान होने वाले हंगामे का भी अन्त कर दिया I जातीय प्रतीकों के भँवर में बुरी तरह फँसी बिहार की राजनीति भी एक प्रतीकात्मक
मुख्यमंत्री के अन्त के साथ ही एक नये मुद्दे को जन्म देती दिखाई देती है I
वैसे तो बिहार के साथ-साथ भारतीय राजनीति में भी प्रतीकों का अपना
ही महत्व रहा है I हमारे पूर्व प्रधानमंत्री भी लंदन से पढ़ाई
करने के बाद भी पिछले 10 वर्षों तक प्रतीकात्मक राजनीति की जीती जागती मिशाल रहे I संसदीय इतिहास में शायद पहली बार ऐसा हुआ कि बजट सत्र को संबोधित करने से
ठीक पहले ही किसी राज्य के मुख्यमंत्री ने अपना त्यागपत्र दे दिया हो I इसी के साथ ही भारतीय राजनीति में व्यक्तियों को प्रतीक बनाकर जातीय राजनीति
करने की पुरानी व्यवस्था को पुनः जीवनदान मिला है I
16 मई 2014 को लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद जनता को लगने लगा था कि
जातिगत आधार पर की जाने वाली राजनीति का अन्त हो गया है I मीडिया में भी हर जगह जातीय राजनीति के खत्म होने की
चर्चायेँ होने लगी थी I कुछ समय से ऐसा लगने था कि विकास की राजनीति
ने हर तरह की जातीय राजनीति को ध्वस्त कर दिया हो I लोग कहने
लगे थे कि लोकसभा का चुनाव तो अमेरिका के पैटर्न पर था जिसमें जातीय-राजनीति का
कोई स्थान नहीं है I लेकिन पिछले कुछ दिनों के राजनीतिक
घटनाक्रम को देखें तो बिहार कि राजनीति में आये इस दिलचस्प मोड ने जातिगत-राजनीति
को फिर से नई धार देनी शुरू कर दी है I अभी कुछ महीनों पहले
तक बिहार के विकास पुरुष कहे जाने वाले नीतीश कुमार ने भारत की जनता को जातीय
राजनीति के नये प्रतीक ‘महादलित’ से
अवगत कराया और उसके बाद अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए अनावश्यक दाव-पेचों
का इस्तेमाल करके बिहार को एक संवैधानिक संकट में डाल दिया था I
2005 में लालू से बिहार को मुक्त कराकर नीतीश कुमार ने बिहार में सुशासन
और विकास की राजनीति के नये युग का सूत्रपात किया था लेकिन 2014 के लोक-सभा चुनाव
के बाद से ही उन्होंने बिहार को फिर से जातीय भँवर में फँसा दिया I कुर्सी की इस लड़ाई में नीतीश कुमार की छवि को भी कोई कम
नुकसान नहीं पहुंचाया है I आज भाजपा पर जाति कार्ड खेलने का
आरोप लगाने वाले नीतीश कुमार इस बात को क्यों भूल जाते हैं कि मांझी को भी
मुख्यमंत्री की कुर्सी पर उन्होंने इसी जाति कार्ड के आधार पर ही बैठाया था I जो बिहार पिछले कुछ सालों से जीडीपी और विकास के लिये जाना जाने लगा था
उसी बिहार ने जातीय समीकरणों के विकास का वही पुराना अध्याय लिखना प्रारम्भ कर
दिया I संविधान के निर्माताओं ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि
किसी राज्य में अल्पमत वाला मुख्यमंत्री भी हो सकता है I यह
ठीक है कि मांझी अल्पमत में थे लेकिन संविधान अल्पमत या बहुमत वाले मुख्यमंत्री
में कोई अंतर नहीं करता I ऐसा लगता है कि भारतीय संविधान
बिहार की राजनीति में आये इस नये अध्याय के लिए पहले से तैयार नहीं था I
अपने बेतुके बयानों-खुलासों से अपनी पहिचान बनाने वाले मांझी भी इस बात को
भली-भांति जानते हैं कि उनके पास एक ऐसा प्रतीक है जिसकी काट किसी भी राजनीतिक दल
के पास नहीं है I ‘गरीब स्वाभिमान सम्मेलन’ के माध्यम से मंच से सभी
समर्थन देने वाले विधायकों को मंत्री पद देने का ऐलान भी उन्होने कर दिया था लेकिन
विधानसभा अध्यक्ष के डर से सदन में जाने से पहले ही उन्होंने अपना इस्तीफा
राज्यपाल को दे दिया I राजनैतिक अनिश्चितता के इस दौर में
बजट सत्र का पहला दिन प्रैस-कॉन्फ्रेंस की भेंट चढ़ गया I अभी
तक सदन के सत्रों के हंगामे की भेंट चढ़ने की बात सुनते थे लेकिन आज प्रैस-कॉन्फ्रेंस
की भेंट चढ़ने की बात पहली बार ही सुनाई पड़ी I इधर मांझी
प्रैस-कॉन्फ्रेंस कर बताते है कि किस तरह से उन्हें और उनके विधायकों को जान से
मारने की धमकी दी जा रही है और उधर नीतीश कुमार भी भावनाओं में बह जाने के लिए बिहार
की जनता से माफी मांगने के साथ ही बीजेपी पर जाति कार्ड खेलने का आरोप लगाते हुए
पूरे घटनाक्रम का दोष बीजेपी के सर डाल देते है I राज्यपाल के विरोध
में सदन के बाहर बैठे विधायक भी काली पट्टी को हटाकर एक दूसरे को गुलाल लगाने लगते
हैं I पिछले कुछ दिनों से महादलित के अपमान पर होने वाली
राजनीति भी अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचकर इस्तीफे साथ ही खत्म हो जाती है I
जदयू, राजद,
कांग्रेस और भाकपा के समर्थन से बनने वाली नयी सरकार महागठबंधन की बात तो करती है
लेकिन उन्हें समर्थन देने वाले क्या नयी सरकार में शामिल होंगे, इस बात पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं देना चाहती है I जातीय
प्रतीकों की राजनीति वाले बिहार की बिसात का भारतीय राजनीति में भी एक महत्वपूर्ण
स्थान है I महादलित की राजनीति करने वाले हमारे राजनीतिक
दलों को क्या महादलित का अपमान संविधान के अपमान से भी बड़ा लगने लगा था ? नैतिकता और न्याय की लड़ाई लड़ने की बात करने वाले हमारे राजनीतिक दल
जात-पात की इस राजनीति से बिहार के कौन से सुनहरे भविष्य के निर्माण का सपना मन में
रखते होंगे ?
नितिन मिश्र
प्रवक्ता भौतिक विज्ञान
nitinmishra97@gmail.com
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