
कुछ ऐसा संघर्ष भरा जीवन मिला उसको भाई।
प्रयास करे कितने भी पर उसने कभी मंजिल ना पाई।।
प्यास लगी है बहुत और उसके हर तरफ पानी है भाई।
पर कभी खारे समंदर ने कहां किसी की प्यास बुझाई।।
डरे सहमे पंछी ने हिम्मत कर जब अपने पंखों को खोला।
बादल बरसे कुछ इस तरह कि पंछी डर से उड़ना ही भुला।।
थक हार कर जब उसने प्रभु भक्ति से आस लगाई,
खुश हुए जब प्रभु बोले चलो कुछ वर मांगो भाई,
खुश होकर उसने अपना जीवन गुलाब के वृक्ष सा मांगा,
यहाँ भी भाग्य ने कुछ इस तरह अपना खेल दिखाया।
जन्म लिया गुलाब के वृक्ष पर,लेकिन रूप कांटे का पाया।।
ऐसे ही संघर्ष कुछ लोगो का चलता जाता।
कितनी भी कर ले भक्ति,पर भगवान भी
उसे समझ ना पाता।।
नीरज त्यागी*
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