Tuesday, July 11, 2017

विश्व व्यापी हिंदी का भारतीय मोड़

हिंदी एक ऐसा जादूगर हैए जो मानवों के हृदय में दिन ब दिन हमला किया जा रहा है। आज तक उस हमले की गति का सिलसिला बढ़ता जा रहा है और मानव भी अपने आप उस करामत की ओर खींचा जा रहा है।इसके पीछे का सबसे प्रमुख कारण हिंदी की अनेकता है। प्रयोगएक्षेत्रए मानव के मनःस्थिति आदि की पहलुओं पर आधारित हिंदी की अनेकतामानव की मनःस्थिति के अनुकूल अनेक रूप धारण करते हुए ज़बान पर चढ़ती है। दुखए प्रेमए प्रसन्नताए हर्षए अकेलापनए मस्तीए दुष्टता आदि मानव की हर किसी भावना से जुड़ी हुई हिंदी की अलग-अलग पहचान हैए जिनके द्वारा श्रोताओं में भी उसी भावना का उत्पादन कर दिया जाता है।
आज तक विश्व के अधिकांश लोगों के द्वारा बोलनेवाली भाषाओं में हिंदी तृतीय स्थान पर खड़ी हैए और द्वितीय स्थान पाने का सिलसिला होता जा रहा है।19वीं शताब्दी में ब्रितानी और फ्रेंच में उपनिवेश में रखे गये भारतीय शर्तबंद मज़दूरों के साथ आरंभ हुई प्रवासी भारतीयों की हिंदी आज ष्प्रवासी हिंदीष् नाम को लेकर विश्व भर घूम रही है। आज उसका बढ़ाव मॉरीशसए फीजीए गुयानाए सूरीनामए ट्रिनिडाड-टुबैगोए बर्माए थाईलैंडए नेपालएमलेशियाएदक्षिण अफ्रीकाए नार्वे आदि लगभग सौ से अधिक देशों तक हुआ हैए बल्कि उसके प्रयोगकर्ताओं की संख्या 2 करोड़ से बढ़कर है। मातृ भाषी भारत वासियों की हिंदी अंतःराष्ट्रीय स्तर पर ष्विश्व भाषाष् का रूप भी धारण कर चुकी है और अन्य विदेशी भाषियों में संपर्क भाषा के रूप में लोकप्रिय हो रही है।
वास्तव में अंतःराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी जिस मोड़ पर ठहरी हैए जिसके पीछे हिन्दी सिनेमा का विराट भूमिका हैए वहाँ से डेढ़ सारे रास्ते खुल चुकी हैंए जिनसे निकली हिंदी रूसए अमेरिकाए कनाडाए इंग्लैंडए जर्मनीए इटलीएबेल्जियमए फ्रांसए रूमानियाए चीनए जापानए स्वीडनए पोलैंडए आस्ट्रेलियाए मैक्सिकोए श्री लंका आदि देशों तक पहुँच चुकी है।
एक ओर विश्व भाषा हिंदी जितनी स्वावलंबन हो रही हैए दूसरी ओर राष्ट्र भाषा हिंदी उससे कई ज़्यादा घट रही है। आज हिंदी विदेशी भाषियों को हिंदी प्राध्यापक बना रही हैएभारत उसी हिंदी को एक ऐसा मोड़ पर ले आया हैए जहाँ से निकलती गलियों पर हिंदी को कम महत्व मिलना रुका नहीं जाता। इतनी परिनिष्ठित हिंदीए जिसके पीछे विराट इतिहास है भारत में दिन.ब.दिन घुल रही हैए जिसका परिणामवशवास्तविक भारतीय पहचान विकृत हो रही हैए क्योंकि हिंदी का उत्तर भारतीय संस्कृति से अटूट रिश्ता हैए जिसे मानव के अपनापन तथा एकता का एक स्रोत कहना तर्कसंगत है।
हिंदी का इतिहास भारत से आये आर्यों की भाषा वैदिकी संस्कृत तक दौड़ता है। (1500 ई0 पूर्व  के आसपासद्) तब से हिंदी की पैदाइश होने तक भारत में कालक्रमानुसार जिन भाषाओं का प्रयोग होता रहा उन सभी का समावेश हिंदी के सूत्रपात से है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान एक ओर अंग्रेज़ भारतीय संस्कृति का ध्वंस कर रहा थाए तब भी हिंदी में उनसे ठोकरे खाते हुए राष्ट्र भाषा संग्राम में भी मुसलमानों की भाषा उर्दू से टकराने की शक्ति इसलिए थीए क्योंकि हिंदी एक भाषा ही नहीं ठहरीए बल्कि भारतियों की संपर्क करने की संस्कृति भी रही। आज हिंदी स्वतंत्र भारत की राष्ट्र भाषा है। उत्तर भारत के दस राज्यों की राज्य भाषा हैए पूरे भारत की जनता की संपर्क भाषा है।
सन् 1947 में मिली स्वतंत्रता के साथ अंग्रेज़ों को भारत छोड़ना पड़ाए अपितु उनहोंने अपने जिन चीजों को भारत में छोड़ आया हैए उनके द्वारा तभी से भारतीयता को गोरा बना दिया जा रहा है। उस शिकारी की ओर हिन्दी का जुज़रना दिन बी दिन तेज़ हो रहा है। आज वह दशा यहाँ तक पहुँच गयी है कि अपनी मातृ भाषा हिंदी से संपर्क करना लोग शर्म कि बात समझते हैं।
समाचार पत्रों तथा पत्रिकाओं की हिंदी में श्ब्दोच्चारण तक बदलाव आ गया है। शब्दों में चंद्रबिंदु चला ही गया है, उसकी कमी बिंदी ने पूरा कर दी है।’ ज ‘ का भी वही स्थिति जिसकी कमी ‘ज ‘ पूरा कर रहा है। इसका फलस्वरूप पाँच का पांचए गाँव का गांव आँगन का आंगन हो गया है तोए सज़ा का सजाए ज़रूर का जरूर और मज़ा का मजा। दूसरी ओर समाचार पत्रों तथा पत्रिकाओं की हिंदी क्रमशः अंग्रेज़ीकरण हो रही है। हर विज्ञापन केए हर आलेख केए हर कविता के हर अनुच्छेद में अंग्रेज़ी शब्दों का प्रयोग होना आम कारण बन चुका है। कभी-कभी हिंदी विज्ञापनों में पूरे अंग्रेज़ी वाक्य तक छपता है।
दूरदर्शन तथा रेडियो के स्तर परप्रस्तुतकर्ताओं तथा आख्यापकों के द्वारा अपने प्रस्तुतीकरण में जिस भाषा का प्रयोग किया जा रहा हैए जो इतना अशुद्ध है कि किसी शुद्ध भाषा की कल्पना करना न मुमकिन हो गया है। इनकी हिंदी का व्याकरण बेडौल बन गया है। लिंग का एहसास चला ही गया है। वाक्यों की शुरूआत हिंदी मेंए अपितु उसका अंत अंग्रेज़ी मेंए बल्कि उर्दू का भी समावेश। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विदेशियों के हृदय तक हिंदी पहुँचने का वाहक बोलिउड की दुनिया हैए लेकिन आज वह दुनिया आधे से ज़्यादा अंग्रेज़ीकारण बन चुकी है। उनके संवादए गीत ही नहीं चलचित्रों के नाम भी अंग्रेज़ी में निकलने लगे हैं। सबसे बड़ी आपत्ति यह है कि हिंदी चलचित्रों के संवाद का लिपिबद्धीकरण अंग्रेज़ी लिपियों से होता है।बोलिउड की दुनियाए जिसका सूत्रपात उत्तर भारतीय संस्कृति पर निर्भर थी तथा उसकी हिंदी माध्यम से अलग पहचान थीए आज उसी दुनिया में गुज़रनेवाला मानव.संसाधन की हिंदी टूटी.फ़ूटी हो गयी हैए आधी अदूरी रह गयी है।
भारत की गली गली पर हिंदी के साथ अंग्रेज़ी भी गूँजने लग गयी है। आम जनता की मनःस्थिति यहाँ तक बदल गयी है कि वे हिंदी के साथ कोई कमी का अनुभव करने लगे हैं। अंग्रेज़ी दृष्टिवाद की जड़ों ने हिंदी को भी घेर लिया है। अंग्रेज़ी पैंट, कमीज़ तथा सङ्ग्लज़ पहनने के बाद हिंदी में बोलना शर्म की बात समझी जाती है।भारत की नयी पीढ़ी ढेड़ सारे हिंदी शब्द, उनके मानक उच्चारण नहीं जानतेए जो उनकी गलती नही , दृष्टिवाद का प्रभाव है, यहाँ तक का वातावरण उसकी पुरानी पीढ़ी के द्वारा निर्माण किया गया है।
हिंदी व्याकरण पर कार्यरत फ्रांस के डॉण् निकोल बलबीर के द्वारा फ्रेंच भाषियों के लिए श्हिंदी मैनुअलश् तैयार किया गया हैए तो भारत वासियों के द्वारा अपने बच्चों की पढ़ाई का माध्यम अंग्रेज़ी बना दी गयी है। अमेरिका में विदेशी भाषा के रूप में हिंदी समझने और सीखनेवालों की संख्या लाखों में हैए तो भारत में अंग्रेज़ी को मातृ भाषा का पद मिल रहा है। जापान के प्रोण् क्यूया दोई के द्वारा ष्हिंदी.जापानी कोशष् तथा ष्जापानी.हिंदी कोशष् की रचना की गयी हैए तो भारत के हिंदी कोश ग्रंथ पुस्तकालयों में छिपे जा रहे है। श्री लंका तथा चीन में हिंदी की प्राध्यापक प्रजा दिन.ब.दिन बढ़ती जा रही है और स्कूली शिक्षा के बाद हिंदी की पंचवर्षीय स्नातक पढ़ाई की व्यवस्था की गयी है तथा बी ए .एम ए और पी एच डी का भी व्यवस्था की गयी है।
राष्ट्र भाषा आंदोलन में14 सितंबर 1949 को संविधान सभा के द्वारा हिंदी राष्ट्र भाषा के रूप में घोषित की गयीए जो हिंदी की बहुत बड़ी जीत रही। उसी जीत के मनाने तथा भारत के अहिंदी क्षेत्रों में हिंदी का प्रचार.प्रसार करने हेतु सन् 1953 सितंबर 14 से राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के द्वारा पूरे भारत में हिंदी दिवस मनाने का आयोयन किया गया। आज यह तिथि भारतियों को हिंदी की याद दिलाने का साधन मात्र बनता जा रहा है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जब 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस मानाते हुए दूसरे देशों के करोड़ों जनता हिंदी को अपना रही हैए भारत वासी उसी हिंदी से खुदका क्या रिश्ता है यह बताना ‘गवारापन’ समझने लगे हैं।
अंग्रेज़ी संस्कृति मानो मोर हैए जो अपने पंकों से भारतियों को फ़िदा करवाते हुए निज पूँजीवाद का शुक्राणु भारत में जगह-जगह छोड़ चला गया। उसकी सफलता यहाँ तक पहुँच गयी है कि जब अंग्रेज़ भारत को छोड़कर 70 वर्ष हो रहा हैए तब अंग्रेज़ी संस्कृति का बच्चा किशोर बन खड़ा रहा है। इस माहौल में अंग्रेज़ी हर किसीको खास बना ही देती हैए किंतु हिंदी उन्हें आम बना देती है।
श्री लंका के केलणिय विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्राध्यापक उपुल रंजित हेवावितानगमागे का कहना हैए श्भारत से ज़्यादा श्री लंका में हिंदी सुरक्षित हैश्। लिखने तथा बोलने के लिए प्रामाणिक व्याकरण से युक्तए संस्कृतए पालिए अपभ्रंश जैसी गहरी भाषाओं से होते हुए उपजीए विभिन्न शैलियोंए प्रयोगों के विचार.विमर्श से बनी मानक हिंदीए जो स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेज़ों के विरुद्ध उठा भारतीय वीरों का नुकीला अस्त्र रहाए आज उन्हीं के द्वारा उसी अंग्रेज़ी को अस्त्र बनाकर जान बूझकर अपना महान शिष्टाचार का ध्वंस किया जा रहा है। (इन्टरनेट फोटो )

डी डी धनंजय वितानगे ( श्री लंका )

1 comment:

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